पंजाब: धन्यवाद देना तो बनता है

मनोरंजन सहाय सक्सेना
मोदी जी कांग्रेस मुक्त भारत चाहते हैं। मगर वह इसके लिये श्रम क्यों कर रहे हैं। कांग्रेस तो स्वयं उन्हें उनका अभीष्ट चांदी की तश्तरी में रखकर परोस रही है। भाजपा में लम्बे समय तक रहकर उसे छोड़कर कांग्रेस में हाल में ही शामिल हुये एक विदूषक को पंजाब जैसे महत्त्वपूर्ण राज्य का आनन-फानन में नेतृत्व सौंपना और उस विदूषक की धमकियों और दवाब में आकर लगभग तीन साल से अधिक कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह जैसे कद्दावर राजनैतिक व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद से हटाकर कांग्रेस खुद आसन्न विधानसभा में अपने द्वारा सत्ता में आने का दरबाजा बंद कर लिया है।
कांग्रेस ने 32 साल पहले 1989 में इसी तरह राजस्थान के पदारूढ़ मुख्यमंत्री शिव चरण माथुर को अगले विधानसभा चुनाव के मात्र तीन माह पहले ही हटाकर हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बना दिया था और परिणामस्वरूप कांग्रेस सत्ता में आने के बजाय चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई थी। राजस्थान में लम्बे समय के बाद भाजपा सत्ता में आई थी। उस समय कांग्रेस ने चुनाव के ठीक पहले केवल 7 दिन में राजस्थान सहित 5 राज्यों में पदारूढ़ मुख्यमंत्रियों मध्य प्रदेश में मोतीलाल बोरा की जगह श्यामाचरण शुक्ल को तो गुजरात में पदारूढ़ मुख्यमंत्री अमर सिंह चौधरी को पदच्युत कर माधवसिंह सोलंकी और ओडिसा में जे.बी. पटनायक के स्थान पर हेमानन्द बिसवाल को और बिहार में सत्यनारायण सिन्हा को मुख्यमंत्री पदच्युत कर जगन्नाथ मिश्र को मुख्यमंत्री पद पर पदारूढ़ किया था। और परिणामस्वरूप इन पांचों राज्यों में अगले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सत्ता में बापसी नहीं कर सकी। मगर उस समय कांग्रेस में दुबारा उठाकर खड़े करने के लिये अनुभवी कद्दावर नेता थे, आज कांग्रेस के पास पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष भी नहीं है। और जो हैं वह स्वयं राजनीति में चुटकुलों के मुख्य पात्र बन गये हैं, शायद इसीलिये उन्होंने पंजाब जैसे महत्त्वपूर्ण राज्य की पार्टी की कमान एक विदूषक को सौंपी, ताकि वह अकेले राजनैतिक चुटकुलों के मुख्य पात्र नहीं रहें।
सिद्धू भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए हैं। यह भी समझ में नहीं आने बाली बात है कि कांग्रेस की यह क्या मजबूरी थी कि एक विदूषक को उसकी शर्तों पर न केवल पार्टी में शामिल किया गया, बल्कि मंत्री पद दिया और विदूषक ने शर्त रखी कि वह मंत्री होते हुये एक बेहूदे से कथित कॉमेडी शो में निर्णायक की भूमिका नहीं छोड़ेगा। क्योंकि यह तो उसकी रोजी-रोटी है और वह मंत्री सुबह 10 बज से शाम 5 बजे तक है। उसके बाद का समय उसका अपना है। इसके बावजूद उस समय कांग्रेस आलाकमान यह नहीं कह सका कि मंत्री 24 घंटे मंत्री होता है और यह वह प्रतिष्ठित पद है जिस पर रहते आप ऐसे फूहड़ शो की होस्टिंग या जज की भूमिका भी नहीं कर सकते।
यह भी समझ में नहीं आ रहा कि पार्टी को तो छोड़ ही दें, परिवार में ही सोनिया गांधी की क्या भूमिका रह गयी है, जब उनकी इच्छा के विरुद्ध राहुल गांधी की इच्छा के चलते एक विदूषक को न केवल पार्टी में शामिल किया गया, बल्कि पहले उसे मंत्री पद दिया गया और उसके ऐसे धमकी भरे बयान- अगर वहां (आलाकमान के यहां) मेरी बात नहीं सुनी गयी तो मैं ईंट से ईंट बजा दूंगा, उसे महत्त्वपूर्ण राज्य के पार्टी अध्यक्ष पद पर यथावत रहने दिया गया। कांग्रेस पार्टी की वर्तमान हालत पर एक फिल्म- अमर प्रेम के गीत की यह पंक्तियां-
मांझी जो नाव डुबोये
उसे कौन बचाये…
एकदम मोजूं लगता है।
भाजपा को पंजाब जैसे महत्त्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस का अगले आसन्न विधानसभा चुनावों में खुद के सत्ता वापसी का रास्ता खुद बंद करने के लिये धन्यवाद तो देना चाहिये।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

1 Comment

  1. मांझी जो नाव डुबोएं
    उसे कोन बचाएं…..
    बहुत ही सटीक राजनीतिक विचारों के लिए धन्यवाद।काग्रेंस खुद अपनी समस्याओं के लिए जिम्मेदार है।कमजोर नेतृत्व और दूरदर्शिता की कमी काग्रेंस को कहीं का नहीं छोडेगी।

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