जितेन्द्र बच्चन
समाज हो या सरकार, सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से कोई कार्य किया जा रहा है तो उसकी प्रसंशा होनी ही चाहिए, लेकिन आज ऐसा नहीं है। विपक्ष में बैठा हर राजनेता विरोध करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। वह इस बात को शक्कर की तरह घोलकर पी चुका है कि अगर उसने सरकार का विरोध नहीं किया तो अगले चुनाव में जनसमर्थन से हाथ धो बैठेगा। यहंा तक कि सकारत्मक मुद्दों पर भी वह विरोध करना अपना धर्म समझता है। विरोध के लिए वह विरोध नहीं करता बल्कि अब तो दिखावे के लिए भी विरोध करने लगा है।
26 मई, 2022 को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने दूसरे कार्यकाल का पहला 6,15,519 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। यह बजट राज्य का अब तक का सबसे बड़ा बजट है। समाज कल्याण योजना के तहत वृद्धावस्था एवं निराश्रित महिला पेंशन राशि बढ़ाकर पांच सौ से एक-एक हजार रुपये कर दी गई है। तीन करोड़ मजदूरों को 500 रुपये मासिक मदद देने का प्रावधान है। पांच साल में रोजगार का लक्ष्य सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग नीति के तहत 40 हजार करोड़ रुपये का निवेश होगा। हर परिवार में कम से कम एक व्यक्ति को रोजगार दिलाएंगे। किसानों को आलू, प्याज और टमाटर की बेहतर कीमत मिले। उज्ज्वला के लाभार्थियों को वर्ष में रसोई गैस के दो सिलेंडर मुफ्त में देंगे। कुल मिलाकर कहें कि योगी आदित्यनाथ ने भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से चुनाव के समय जो वादे किए थे, पार्टी ने जिस संकल्प पत्र को सार्वजनिक किया था, इस मेगा बजट के माध्यम से उसे जमीं पर उतारने की कोशिश की गई है।
योगी सरकार ने प्रदेश के विकास को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाने का प्रयास किया है। सृजन का संकल्प लिया है, किसानों की उन्नति के रास्ते खोलने की बात की है और रोजगार के साथ-साथ विकास को भी रफ्तार देने की कोशिश की है। सेहत दुरुस्त रहे, युवाओं को रोजगार मिले और किसानों के लिए खाद-बीज से लेकर सोलर पंप तक का इंतजाम हो, गन्ने की मिठास कायम रहे। इसके अलावा अल्प आय वर्ग के पांच लाख ग्रामीणों को आवास देने और जल जीवन मिशन कामयाब बनाने पर भी जोर दिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने तमाम ऐसे उपाय सुझाए हैं, जिससे यह बजट आम लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इधर कई मामलों में योगी सरकार खरी भी उतरी है, इसलिए हमें उसके इस बजट पर भरोसा करना चाहिए। देखना चाहिए कि वह आगे सामाजिक उत्थान और विकास में कहां तक अपने वादों पर सही ठहरती है लेकिन कई राजनीतिज्ञों की बजट को लेकर जो प्रतिक्रिया सामने आई है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह धैर्य रखने को कौन कहे, सरकार के सकारत्मक पहलू को सुनने को भी राजी नहीं हैं। यह अच्छी बात नहीं है। आप विरोध कर के उस जनता को भी गुमराह कर रहे हैं जो सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त कर सकती है और योगी सरकार उसे उसका हक देने की बात लगातार कर रही है।
सपा मुखिया अखिलेश यादव ने तो इस बजट को बंटवारा करार दिया है। उनका कहना है- यह बजट नहीं आंकड़ों का मकडज़ाल है। सरकारी विभागों का वारा-न्यारा है। जनपक्ष नदारद है। खैर, राजनीति अपनी जगह है। पार्टी या दल कोई भी हो, अपनी-अपनी रोटी सेकने से कोई बाज नहीं आएगा, लेकिन अब योगी आदित्यनाथ सरकार के सामने जो बड़ी चुनौती है वह यह है कि बजट की तमाम घोषणाओं को धरातल पर कैसे लाया जाए। क्योंकि सरकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनाना कोई राजनीतिक बयानबाजी का खेल नहीं है। नौकरशाही का नकारापन, विपक्ष के विरोध की रणनीति, आखिरी पायदान पर खड़ी जनता जनार्दन तक सरकारी मदद पहुंचाने की चुनौती से उसे निपटना होगा। यह कठिन समस्या ही नहीं बल्कि इससे निजात पाते हुए सरकार को आम लोगों को बीच लोकप्रिय भी होना है। क्योंकि योगी सरकार की इस कामयाबी पर ही आने वाले लोकसभा चुनाव की उम्मीद टिकी है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि केन्द्र में सरकार बनाने के लिए हर रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। यूपी मजबूत होगा तो केन्द्र में उसकी सरकार फिर से बनेगी, इसलिए भी योगी आदित्यनाथ सरकार को अपनी कार्यप्रणाली से यह साबित करना होगा कि उनका यह बजट प्रदेश में विकास को गति देने के साथ-साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने वाला है। उनका लक्ष्य कमजोर वर्ग को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


Leave a Reply