कैलाश चंद्र वशिष्ठ की पुस्तक ‘मिर्जा गालिब की शायरी में वेदांत दर्शन’ का लोकार्पण

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
नई दिल्ली। आईटीओ विष्णु दिगंबर मार्ग स्थित हिन्दी भवन में गायत्री साहित्य संस्थान दिल्ली द्वारा कैलाश चंद्र वाशिष्ठ (समीर देहलवी) की पुस्तक ‘मिर्जा गालिब की शायरी में वेदांत दर्शन’ का लोकार्पण एवं पुस्तक-परिचर्चा एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। रविवार, 13 अक्टूबर को आयोजित कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्याकार व पत्रकार डॉ. धनञ्जय सिंह रहे। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार महेश दर्पण ने की। जबकि पुस्तक परिचर्चा में विद्वान डॉ. धनज्जय सिंह, महेश दर्पण, प्रेम पाल शर्मा, मोईन शादाब, सुश्री संतोष खन्ना, डॉ. स्नेहा ठाकुर (सम्मानित अतिथि कनाडा) सम्मिलित हुए।
समारोह में पत्रकार वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेन्द्र बच्चन भी शामिल रहे। उन्होंने कहा कि गालिब की गजलों में जिसे तसव्वुफ (अध्यात्म) का रंग कहा जाता है, उसका स्रोत मात्र इस्लामिक तसव्वुफ ही नहीं, बल्कि उसके संकेत वेदांत दर्शन में भी मिलते हैं। और यह बात पुस्तक के लेखक कैलाश वशिष्ठ ने बाखूबी दर्शयी है। लेखक ने बताया है कि गालिब के कई अशआर में आदि शंकराचार्य और रामानुज के वेदांत दर्शन की रहस्यपूर्ण एवं सटीक अभिव्यक्ति भी मिलती है।
बच्चन ने कहा कि जैसे अद्वैत वेदांत में जगत को मिथ्या माना गया है, वैसे ही गालिब के कई शेरों में जगत को मिथ्या ही बताया गया है। दरअसल, गालिब तर्कयुक्त बुद्धि के स्वामी थे। वह किसी भी बात को बिना अपने मस्तिष्क में परीक्षण किए नहीं मानते थे। उनका मंतकी (तर्कपूण) जेहन उनको सच्चाई तक पहुंचने में बहुत मदद करता था। वे या तो किसी बात को स्वीकार कर लेते थे या फिर उस पर सवालिया निशान लगा शेर के माध्यम से प्रस्तुत करते थे। उनका जेहन एकतरफा बात को कभी स्वीकार नहीं करता था। उन्होंने कहा कि गालिब के अशआर में मानवियत (अर्थपूर्णता) की कई तहें (परतें) हैं। इसलिए किसी एक ही अर्थ पर व्याख्याकारों को सीमित नहीं रहना चाहिए। बच्चन ने ये गुजारिश भी कि गालिब के कलाम के नए-नए अर्थ तलाश किए जाते रहने चाहिए।
कार्यक्रम का संचालन इंद्रजीत सुकुमार ने किया। जबकि संयोजन गायत्री साहित्य संस्थान की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. हेमलता (बबली वशिष्ठ) और सह संयोजन संस्थान की महासचिव सुश्री मंजू वशिष्ठ (मिथिलेश) का रहा। कार्यक्रम में सुशील शैली, प्रणव वशिष्ठ (विभु), सुश्री अपर्ण वशिष्ठ (बुलबुल) आदि का विशेष योगदान रहा। समारोह का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्जवलित कर किया गया। उसके बाद सभी अतिथियों का पुष्प गुच्छ, प्रतीक चिन्ह देकर और शाल ओढ़ाकर स्वागत-सम्मान किया गया। इस अवसर पर आलोक यात्री, प्रवीण कुमार, सुरेन्द्र शर्मा और दिल्ली एनसीआर के कई वरिष्ठ पत्रकार व साहित्याकर उपस्थित रहे। बबली वशिष्ठ ने सभी के प्रति आभार जताया है।

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