पंडित हरिदत्त शर्मा
गाजियाबाद। सुप्रसिद्ध तबला वादक एवम् लेखक प्रोफेसर गिरीशचंद्र श्रीवास्तव 28 फरवरी 1933 को इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में जन्मे थे। खैरागढ़ विश्वविद्यालय की स्नातकोत्तर परीक्षा 1982 की वरीयता सूची में आपने प्रथम स्थान प्राप्त किया। अपने नगर के सुविख्यात गुरु श्री लालजी श्रीवास्तव से निरंतर 22 वर्षों तक गुरु शिष्य परंपरा से तबले की विधिवत शिक्षा प्राप्त की। सन 1952 से लगातार आपके वादन का आकाशवाणी से प्रसारण हुआ। लेखन की प्रेरणा आपको अपने अग्रज प्रो हरिश्चंद्र श्रीवास्तव से मिली।
आपने प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुल मिलाकर 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। आपको संगीत आचार्य, तालमणी तथा प्रयागश्री आदि उपाधियों से भी विभूषित किया गया। आपने बहुचर्चित पुस्तकों ‘ताल परिचय’ भाग 1,2,3, ताल प्रवेशिका, ताल प्रभाकर प्रश्नोत्तरी एवम् ताल कोश आदि का सफल लेखन व प्रकाशन किया। प्रसिद्ध तबला वादक एवम् लेखक होने के साथ ही आप एक नेक इंसान भी थे। आपके द्वारा लिखित पुस्तकें बहुत ही कम मूल्य पर छात्रों को उपलब्ध हुईं । पूरे उत्तर भारत में तबले का शायद ही कोई ऐसा विद्यार्थी हो, जिसने आपकी पुस्तक न पढ़ी हो। प्रत्येक संगीत प्रेमी के घर- घर में आपकी पुस्तकें मिलेंगी।
ऐसे मूर्धन्य संगीतज्ञ, वादक एवं लेखक प्रोफेसर गिरीशचंद्र श्रीवास्तव रविवार, 16 अगस्त 2020 को इस लोक को छोड़कर परम तत्व में विलीन हो गए। आपके द्वारा दिए गए अमूल्य ज्ञान हेतु संपूर्ण संगीत जगत सदैव आपका ऋणी रहेगा। वी एन भातखंडे संगीत महाविद्यालय गाजियाबाद के अध्यक्ष एवं निर्देशक पंडित हरिदत्त शर्मा (सदस्य- उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ ) ने राग मियां की सारंग गाकर प्रो. श्रीवास्तव को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा 7.30 मिनट का वीडियो जिसमें पंडित जी का संदेश व गायन है, वह भी जारी किया। पंडित हरिदत्त शर्मा ने कहा कि प्रोफेसर गिरीशचंद्र श्रीवास्तव भले ही आज हमारे बीच नहीं रहे, किन्तु उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें हर संगीत प्रेमी के हृदय में उन्हें सदा जीवंत रखेंगी। संगीत के आकाश में सूर्य व चंद्रमा की भांति उनका नाम सदैव उजागर रहेगा।


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