आज 15 अगस्त है, हमारी आज़ादी का दिन। विश्व के कुछ हिस्सों समेत सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाने वाला राष्ट्रीय पर्व। सोचिये सही मायने में हम उस दिन आज़ाद हुए थे या मात्र शक्ति और सत्ता का हस्तांतरण हुआ था। गोरों की जगह काले भारत भाग्यविधाता बने थे उस दिन, हमने प्रजातंत्र अपनाया और आज विश्व का सबसे बड़ा और शायद सबसे जटिल प्रजातंत्र हमारे पास ही है।
किसी भी देश का संविधान उसके नागरिकों के लिए गीता, कुरान या बाईबल से ऊपर होता है पर हमारे देश की विडंबना है कि हम आज तक यही नहीं समझ पाए कि हम किसके कानून से शासित हैं, संविधान से, धर्म से या उनकी कुरीतियों से। अल्पसंख्यक, आस्था, श्रद्धा और विश्वास नाम के तमाम खंजर समय-समय पर संबिधान को लहूलुहान करते रहते हैं। हमारा संविधान आज तक अल्पसंख्यक की व्यवहारिक परिभाषा नहीं बता पा रहा है। उच्चतम न्यायालय के न्याय को भी संसद में चुनौती दी जाती रही है, हमारे कई विभाग सदियों पुरानी कानूनी व्यवस्था से आज भी चलाये जा रहे हैं। घुड़सवारी युग से शुरू हुआ पुलिस विभाग सायकिल, मोटरसाइकिल और अतिआधुनिक संसाधनों से युक्त गाडिय़ों तक पहुँच गया पर कार्य प्रणाली में व्यापक सुधार नहीं हो पाया।
आज हम आजाद हैं, अभिव्यक्ति की आज़ादी समेत तमाम आजादी हमें प्राप्त है पर कभी उनका गला घोंटा जाता है और कभी हम उच्छृंखल हो जाते हैं।
हमने गुलामी नहीं देखी है इसलिए गुलामी का दंश और आजादी की कीमत हमे नहीं पता है, पढऩे और सुनने वाले का यहसास देखने और भोगने वाले के अहसास की कभी बराबरी नहीं कर सकता है। बच्चों के हाथ में तिरंगा देकर प्रभात फेरी निकालकर बूंदी और लड्डू बांट देने भर से आजादी का उद्देश्य नहीं पूरा हो जाता है। उस दिन दूरदर्शन पर देशभक्ति की फिल्म दिखाकर, दिन भर गली-गली में डीजे और लाउडस्पीकर पर कानफोडू देशभक्ति के संगीत बजाकर हम आजादी के सही अर्थ तक नहीं पहुँच सकते हैं।
आज प्राथमिक शिक्षा मृतप्राय है। शायद ही कोई हनुमान उसके लिए संजीवनी ला पाए। शिक्षा का निजीकरण और व्यवसायीकरण हो चुका है। पेड़ों और कागज की इतनी कमी होने के बावजूद मां-बाप अपने छोटे बच्चों के लिए प्रतिवर्ष नई और मंहगी किताबें खरीदने के लिए बाध्य हैं। चिकित्सा व्यवस्था स्वयं रोगी है, मंहगी कीमत पर दवाइयां खरीदने के लिए मरीज मजबूर हैं। हर मरीज के ऊपर टेस्ट करवाने का इतना दबाव बना दिया जाता है कि डॉक्टर का वश चले तो पेचिस में भी सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड करवाकर ही दम लें। न जाने इस व्यवस्था पर कब अंकुश लगेगा। ऊपर वाले पर हमारी पूर्ण आस्था व विश्वास है, इसलिए हम अपने आपको सुरक्षित महसूस कर लेते हैं। ऐसा नहीं है कि अच्छे ईमानदार नेता, व्यापारी, अधिकारी या कार्यकर्ता नहीं हैं पर उनकी संख्या कम होने की वजह से भ्रष्ट व्यवस्था उन पर हमेशा हावी रहती है। अगर गांधीजी के रामराज्य का सपना पूरा करना है तो प्रत्येक विभाग को चुस्त-दुरुस्त बनाना होगा। बिना सर्वांगीण विकास किये रामराज्य का सपना कैसे पूरा होगा। राम राज्य की एक झलक देखिए –
बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई ।। ( सामाजिक भाईचारा एवम समरसता)।
दैहिक दैविक भौतिक तापा राम राज काहू नहि व्यापा ।। ( चिकित्सा व आपदा प्रबंधन की श्रेष्ठता)।।
सब नर करहिं परस्पर प्रीति चलहिं स्वधर्म निरति श्रुति नीती (धर्मानुकूल आचरण एवम सौहार्दपूर्ण वातावरण) ।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना (गरीबी रेखा के ऊपर और शिक्षा व्यवस्था उत्तम)।।
आज हम आजाद हैं, हमने अब तक काफी प्रगति किया है, परन्तु यह जिम्मेदारी सिर्फ साधु महात्मा, कोई व्यक्ति विशेष या सरकार की ही नहीं है, सरकारें या समाज बदलते रहते हैं, राष्ट्र शाश्वत है, जिस दिन हम सब लोग अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझने लगेंगे, उस दिन हम विश्व की अग्रणी पंक्ति में होंगे। आशा रखिये, वह दिन बहुत दूर नहीं है।
सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं! जय हिंद, जय भारत!
(लेखक चितंक व वरिष्ठ समाजसेवी हैं।)


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