किसानों का कंधा अंतरराष्ट्रीय साजिश का धंधा

सुरेशपाल वर्मा जसाला
समय-समय पर विश्व ने बहुत आन्दोलन देखे हैं। आन्दोलन असंतोष की जननी होते हैं और दोनों पक्षों की वार्ता से कई बार समाधान भी निकले हैं। लेकिन कई बार आन्दोलनों की आड़ में कोई तीसरा पक्ष स्वार्थ सिद्धि भी ढूंढने लगता है। ऐसे में आन्दोलन अपने पथ से भटक जाता है। इस बार भी भारत में कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा किसानों का आंदोलन अंतरराष्ट्रीय साजिश का शिकार हो चुका है और यह धीरे-धीरे विपक्षी दलों की हवा से पथ-भ्रमित हो मोदी विरोध पर आ टिका है।
किसान को भारत में अन्नदाता कहा जाता है, यह उसके सम्मान की पहचान है। हमारे यहां ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा भारत मां की सुरक्षा और समृद्धि की दो इकाइयों के अभिनंदन का सूचक है। जवान देश की सुरक्षा के प्रति समर्पित भाव से कटिबद्ध है तो किसान खेतों में परिश्रम कर देशवासियों के पेट की क्षुधा का निवारण करता है।
जवान और किसान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक सीमा का शौर्य है तो दूसरा खेतों का सौन्दर्य। खेतों के सौन्दर्य के सपूत ही सीमा के शौर्य की शान हैं, जो अपने साहस और पराक्रम से दुश्मन को धूल चटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। अंततः विजयश्री उनके कदम चूमती है।
किसानों के आन्दोलन को सरकार सम्मान देते हुए उनकी समस्याओं और आपत्तियों को दूर करने के लिए तैयार है, लेकिन विपक्षी हवा और विदेशी ताकतों के प्रभाव और जाल में फंसकर किसान नेता केवल कृषि कानूनों को रद्द करने पर अड़ गए और मोदी विरोध में गणतंत्र दिवस पर घिनौना कृत्य करने से भी बाज नहीं आए। जान-बूझकर विश्व में भारत की छवि को धूमिल करने का कलंकित प्रयास किया गया।
रक्षक पुलिस बल पर डंडे, तलवारों, फरसों, लोहे की छड़ों के प्रहार के साथ ट्रैक्टर चढ़ाकर भी अत्याचार करने का प्रयास किया गया। भारत की शान ऐतिहासिक लाल किला को रौंदकर रख दिया, दिल्ली के कई क्षेत्रों में अत्याचारी तांडव देखने को मिला। फिर भी विदेशी ताकतों के हाथ की कठपुतली बन चुके किसान नेता समाधान नहीं कानून के निरस्तीकरण पर अड़े हैं। मोदी विरोध में वे मर्यादाओं को लांघकर राष्ट्रहित को भी भूल चुके हैं। अपने ही जवानों पर वार करने से नहीं चूक रहे। यह एक संवेदनहीन कुकृत्य है, जिसके लिए किसान देश की निंदा का पात्र बना है।
सरकार और किसान नेताओं को वास्तविक धरातल पर शांत चित्त से राष्ट्रहित और राष्ट्र गौरव के परिप्रेक्ष्य में चिंतन-मनन कर समाधान निकालना चाहिए। यह देश भारतीयों का है, भारतीयों के लिए है और भारतीयों का गर्व है। इसकी संस्कृति, उन्नति और गौरव की रक्षा करना हर भारतीय का दायित्व और जिम्मेदारी है।

(लेखक शिक्षाविद एवं साहित्यकार हैं।)

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