राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के तत्वावधान में रविवार को आरडीसी राज नगर में मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कवियों ने अपनी कविताओं से जमकर साहित्यिक रंग जमाया। गोष्ठी का आगाज़ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर व आशीष मित्तल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर के किया। नवोदित कवि अंकित वशिष्ठ ने गांव व शहरी जीवन शैली की तुलना करते हुए यथार्थवादी कविता पढ़ी। अंकित ने अपन काव्य पाठ करते हुए पढ़ा कि ‘लौटकर आना चाहता हूं फिर से गांव की चाहरदीवारी में…।’
कवि व समाजसेवी बी एल बत्रा ने अपनी रचना कुछ यूं पढ़ी- ‘मैं लिखूं भी तो क्या लिखूं, क्या दर्द की सौगात लिखूं…।’ आशीष मित्तल ने अपने भावों का कविता में चित्रण करते हुए पढ़ा- ‘इच्छाओं का घर हूं, हिम्मत हूं, मैं डर हूं…।’ सुदामा पाल ने वर्तमान शिक्षा के संदर्भ में अपनी रचना पढी- ” बच्चे काबिल बनाये जा रहे हैं, जो ऑनलाइन पढ़ाये जा रहे हैं…।” इंद्र कुमार ‘सुकुमार’ ने तरन्नुम से अपनी कविता पढ़ी- ‘रिश्तों की सीमा से कोई रिश्ता उर में जागे, संबंधों की उड़ी पतंगें, उलझे रहे रिश्तों के धागे…।’
वरिष्ठ अधिवक्ता व कवि प्रवीण कुमार ने समय काल को बड़े ही सुंदर ढंग से कविता में ढाला। उन्होंने पढ़ा कि-काल जो है सतत प्रवाहमान… भूत-भविष्य-वर्तमान… उसमें कहीं नहीं होता वर्तमान…।’ गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि सुरेंद्र शर्मा ने गांव से आकर शहर में बसने वालों को गांव की याद दिलाने वाली कविता सुनाई। उन्होंने अपनी कविता पढ़ी- वही बरगद, वहीं दालान है, अब भी, नही बिजली, मकान वीरान है अब भी…।”
गोष्ठी का संचालन प्रवीण कुमार ने किया। गोष्ठी में हिन्द आत्मा के संपादक अशोक कौशिक, वरिष्ठ अधिवक्ता हिरेंद्रकांत शर्मा, आसिफ खां भी मौजूद रहे।


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