राष्ट्रीय जनमोर्चा ब्यूरो
पटना। नीतीश कुमार के केंद्र की राजनीति में जाने के साथ ही इस पर घमासान मचा है कि बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा और जेडीयू का उत्तराधिकारी किसे बनाया जाएगा। यहां तक कि विपक्षी दल भी नीतीश को लेकर तरह-तरह के सवाल उठा रहा है।
वैसे देखा जाए तो नेतृत्व का संकट सिर्फ जेडीयू के लिए ही नहीं, बल्कि बीजेपी के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। बिहार में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद राज्य में वह अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती।वह हमेशा जेडीयू और नीतीश कुमार के सहारे सत्ता में बनी रही है। ऐसे में अगर जेडीयू कमजोर पड़ती है या नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो यह बीजेपी के लिए एक अवसर बन सकता है।
उल्लेखनीय है कि जेडीयू का गठन 2003 में हुआ था और पार्टी पिछले 22 वर्षों से नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार की राजनीति में अहम भूमिका निभा रही है। हालांकि, पार्टी के भीतर कई नेताओं का उभार भी देखा गया, जिनमें आरसीपी सिंह, ललन सिंह, प्रशांत किशोर और उपेंद्र कुशवाहा प्रमुख नाम हैं। समय के साथ इनमें से कई नेता पार्टी से अलग हो गए और अपनी राजनीतिक राह बना ली। ऐसे में जेडीयू के भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
उधर नीतीश कुमार के केंद्र में जाने से सबसे बड़ा सवाल है कि मुख्यमंत्री पद किसके पास होगा। उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। इसे लेकर कयास भी लगाए जा रहे हैं। इस दौड़ में नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, विजय कुमार चौधरी और अशोक चौधरी के नाम सबसे आगे है। हालांकि, पार्टी के अंदर ही इनकी स्वीकार्यता को लेकर मतभेद हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि करीबी होना अलग बात है और नेतृत्व क्षमता अलग।
तो क्या नीतीश कुमार के बाद जेडीयू की बागडोर संभालेंगे, इस सवाल का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन पार्टी के अंदर यह चर्चा तेज है कि उनके बेटे निशांत कुमार मुख्यमंत्री बन सकते हैं। यह अलग बात है कि नीतीश कुमार हमेशा से परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं, लेकिन पार्टी के भीतर निशांत कुमार की एंट्री को लेकर लगातार मंथन चल रहा है। हो सकता है कि मुख्यमंत्री नहीं तो निशांत कुमार पार्टी के मुखिया जरूर होंगे।


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