इलाज माँगकर शर्मिंदा न करें

रवि अरोड़ा
कल से सोशल मीडिया पर एक ख़ास क़िस्म के संदेश वायरल हो रहे हैं। इन संदेशों में नकारात्मकता न फैलाने की ताकीद की जा रही है और कहा जा रहा कि कोरोना से जब लाखों लोग ठीक भी तो हो रहे हैं , उनकी बात क्यों नहीं की जा रही। किसी-किसी मैसेज में तो उन लोगों की लानत-मलानत भी की जा रही है जो अस्पतालों में बेड, आक्सीजन, वेंटीलेटर और दवा की कमी का रोना रो रहे हैं। कोरोना से मरने की जानकारी देने वालों को भी आड़े हाथों लिया जा रहा है। पहली नज़र में तो मुझे भी यह बात जमीं कि लुटने-पिटने की ख़बरों से वाक़ई मरीज़ों और उनके परिजनों का मनोबल टूटता है, अतः माहौल में सकारात्मकता की ठंडी बयार तो बहनी ही चाहिये। फिर अचानक मन में सवाल कौंधा कि ऐसा क्या हुआ कि कल से पहले ऐसे संदेश कहीं दिखाई नहीं पड़े और अब अचानक आधे से अधिक संदेशों में कोरोना की विभीषिका और संसाधनों की कमी सम्बंधी ख़बरों को घेरा जा रहा है? क्या यह अपनी कमियों को छिपाने के लिये सत्ता के आईटी सेल का खेल तो नहीं? ऐसे में जब पूरी केंद्र सरकार बंगाल चुनाव में व्यस्त है और उसके वापस लौटने में अभी समय है, तब तक कोरोना की बजाय उसकी ख़बरों को कंट्रोल करने का यह कोई सियासी खेल तो नहीं है? माहौल में सकारात्मकता हो अच्छी बात है मगर अच्छी व्यवस्था हो इस पर भी तो बात हो। हो सकता है मेरी बात में भी नकारात्मकता ढूँढी जाये मगर व्यवस्था को आइना ही न दिखाया जाये, यह कहाँ की सकारात्मकता है?
कल से खाँसी हो रही थी। डाक्टर ने कहा, भाप लो और आक्सीजन लेवल चेक करते रहो। मेडिकल स्टोर पर गया तो पता चला कि स्टीमर आउट ऑफ स्टाक है। ओक्सिमीटर भी उपलब्ध नहीं था। दुकानदार ने बताया कि 29 मार्च से बाज़ार से ये सामान लगभग ग़ायब हैं। बीस दिन पहले जो स्टीमर 200 रुपये का धक्के खा रहा था, उसे होलसेलर अब साढ़े तीन सौ रुपये में दे रहे हैं और वह भी एडवांस पैसे लेकर। सात सौ रुपये का ओक्सीमीटर अब 1800 में भी उपलब्ध नहीं है। नेबुलाईज़र भी दोगुनी क़ीमत पर मिल रहा है। कोरोना के चलते मशहूर हुई रेमेडिसिविर दवा की तो कोई क़ीमत ही नहीं। बीस हज़ार में भी उसकी वॉयल मिल जाये तो ग़नीमत है। अस्पताल वाले मरीज़ के परिजनों से कह रहे हैं कि आक्सीजन का इंतज़ाम ख़ुद करो वरना अपना पेशेंट कहीं और शिफ़्ट करा लो। वेंटिलेटर वाला बेड तो दूर-दूर तक ढूँढे से नहीं मिल रहा। अप्वाइंटमेंट के बावजूद कमी के चलते वैक्सींन नहीं लग रही। आरटी पीसीआर टेस्ट की किट तो ग़ायब हैं ही।
कोरोना को कोहराम मचाते हुए सवा साल हो गया, समझ नहीं आ रहा कि इस दौरान सरकार ने क्या तैयारी की? कहाँ हैं सरकारी इंतज़ाम? मुआफ़ कीजिये आपको लगेगा कि मैं भी नकारात्मकता फैला रहा हूँ। मगर सरकार का गिरेबाँ बचाने को झूठी सकारात्मकता कहाँ से लाऊँ? कैसे उन नेताओं को क्षमा कर दूँ जो परेशान लोगों के फ़ोन नहीं उठा रहे और यदि उठा भी लें तो कह रहे हैं कि अस्पताल में बेड के अलावा कोई और बात हो तो बताओ। ऐसा लग रहा है जैसे पुराने मोहल्लों की किसी दुकान पर हम खड़े हों और जहाँ बड़ा-बड़ा लिखा हो- उधार माँगकर शर्मिंदा न करें अथवा उधार प्रेम की कैंची है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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