ऑटिज्म बच्चों के विकास के प्रति डॉ नेहा लोगों को कर रहीं जागरूक

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। संयुक्त राष्ट्र के आह्वान पर इस बार अप्रैल में विश्व ऑटिज्म जागरूकता माह मनाया जा रहा है। प्रयास लर्निंग फाउंडेशन गाजियाबाद की अध्यक्ष डॉ. नेहा पुंडीर ने भी पिछले दिनों लोगों को जागरूक करने के लिए ‘ऑटिज्म जागरूकता’ रैली का आयोजन किया था। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के बारे में जागरूकता बढ़ाने और ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों के लिए समावेशिता, समझ और समर्थन देने के लिए पूरी तरह समर्पित है।
डॉ नेहा ने ‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ को बताया कि ऑटिज़म एक प्रकार का न्यूरो डेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसे मेडिकल भाषा में ऑरिज़्म स्पेक्ट्रम्स डिसऑर्डर भी कहते हैं। इस डिसऑर्डर में बच्चों की भाषा का विकास देरी से होना, उम्र के हिसाब से बातचीत करने का लेवल कम होना या एक ही तरह के व्यवहार को बार-बार दोहराना आदि देखा जाता है। आमतौर पर इस तरह के बच्चे अपनी बात ठीक से नहीं कह पाते और न ही सामने वाले को समझा पाते हैं। अन्य लोगों से मिल-जुलकर रहने में भी इन्हें परेशानी होती है।
साइंस के मुताबिक, अभी तक इसके सही कारणों का पता नहीं चल पाया है और वर्तमान में हर 52 बच्चों में से एक बच्चा इस अवस्था में पाया जा रहा है। इसलिए इसके बारे में जानना-समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। डॉ नेहा बताती हैं, ‘ऑटिजम में हर बच्चों में लक्षण कुछ कुछ अलग हो सकते हैं। कुछ बच्चों में बोलने की अधिक दिक्कत होती है और कुछ में प्रोब्लेमेटिक बिहेवियर अधिक होते हैं।’
डॉ नेहा इसके लक्ष्णों को बताते हुए कहती हैं, “आमतौर पर इन बच्चों में स्पीच डिले, अन्य बच्चों की तरह मिलनसार न होना या अकेले में खेलना ज़्यादा पसंद करना, नाम से पुकारे जाने पर भी हर बार पलट कर न देखना लक्ष्ण देखने को मिलते हैं। इसके अलावा इस तरह के बच्चे ज़्यादा ज़िद करते हैं, एक जगह टिक कर नहीं बैठते, आई कांटेक्ट न कर पाना, सुनी हुई बात या शब्दों को बार-बार दोहराना, खिलौनों से खेलने के बजाए उन्हें लाइन में लगाते रहना, खुश होने और हाथ फड़फड़ाना या उछलना-कूदना ज़्यादा करते हैं।”
डॉ नेहा सलाह देती हैं, “अगर आप अपने बच्चों में इस तरह के कोई भी लक्षण देखते हैं तो माता पिता को पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट को अवश्य कंसल्ट करना चाहिए। यह एक ऐसी स्थिति होती है, जिसका इलाज दवा से संभव नहीं है। लेकिन अगर इसे शुरुआती वर्षों में ही पहचानकर जल्दी ऑक्यूपेशनल थेरेपी शुरू कर दी जाए तो कई प्रोब्लेमेटिक बिहेवियर में सुधार आ सकता है!”

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