लखनऊ में मनाई गई महाराणा प्रताप व राजा छत्रसाल जयंती

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
लखनऊ। महापुरुष स्मृति समिति के तत्वावधान में नाका हिंडोला विजयनगर स्थित जगत कुटी में रविवार को महाराणा प्रताप और राजा छत्रसाल जयंती मनाई गई। दोनों महापुरुषों का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को हुआ था। कार्यक्रम के उपरांत हुसैनगंज चौराहा पर स्थित महाराणा प्रताप की प्रतिमा पर समिति के कार्यकर्ताओं ने पुष्पवर्षा की। इस दौरान यहां बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा के संयोजक संत मुरारी दास उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि अप्रतिम वीर महाराणा प्रताप एक समाज के नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए स्वाभिमान, शक्ति, स्वाधीनता और संपन्नता के प्रतीक थे। महाराणा प्रताप को बहादुरी और पराक्रम विरासत में मिली थी।
मुरारीदास ने कहा कि महाराणा प्रताप उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ़-प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल राजा अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई वर्षों तक संघर्ष किया। महाराणा ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। महाराणा प्रताप मेवाड़ के 13वें महाराणा थे। वर्तमान में यह कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजसमंद जिला, राजस्थान स्थित है। इतिहासकार विजय नाहर के अनुसार राजपूत समाज की परंपरा व महाराणा प्रताप की जन्म कुण्डली व कालगणना के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म पाली के राजमहलों में हुआ। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 500 भील लोगों को साथ लेकर राणा प्रताप ने आमेर सरदार राजा मानसिंह के 80,000 की सेना का सामना किया। हल्दीघाटी युद्ध में भील सरदार राणा पुंजा जी का योगदान सराहनीय रहा।
13 जून को समिति के अध्यक्ष व कार्यक्रम के संयोजक भारत सिंह ने ‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ को बताया कि महापुरुष स्मृति समिति वर्षों से महापुरुषों का जन्मदिवस भारतीय तिथि के अनुसार करती आ रही है। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के शिवाजी के नाम से प्रख्यात राजा छत्रसाल का जन्म भी ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को विक्रमी संवत के अनुसार 1706 में विन्ध्य वनों की मोर पहाड़ियों में हुआ था। वर्तमान में यह स्थान बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के ककर कचनाए गाँव में है। इनकी माताजी का नाम लालकुंवरि था और पिता का नाम था चम्पतराय। चम्पतराय भी बड़े वीर व बहादुर व्यक्ति थे। चम्पतराय के साथ युद्ध क्षेत्र में लालकुंवरि भी साथ-साथ रहतीं और अपने पति को उत्साहित करती रहतीं। गर्भस्थ शिशु छत्रसाल तलवारों की खनक और युद्ध की भयंकर मारकाट के बीच बड़े हुए। यही युद्ध के प्रभाव उसके जन्म लेने पर जीवन पर असर डालते रहे। माता लालकुंवरि की धर्म व संस्कृति से संबंधित कहानियां बालक छत्रसाल को बहादुर बनाती रहीं।
कार्यक्रम में सुरेश सिंह, रवीन्द्र सिंह कुशवाहा, एडवोकेट पुष्कर सिंह सनी, अजीत सिंह, वीरेंद्र त्रिपाठी, एडवोकेट अनुरक्त सिंह, फोटो पत्रकार सुशील सहाय, डा. विवेक सिंह, अर्पिता सिन्हा, निकहत की उपस्थिति प्रमुख रही।

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