बाजारों में पसरे सन्नाटे से फीकी पड़ी चमक
वंदना श्रीवास्तव
लखनऊ। अक्षय तृतीया वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। वैशाख मास की यह तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में श्रेष्ठ मानी गई है। लेकिन बाजार बंद होने से इस बार अक्षय तृतीया की चमक फीकी पड़ गई।
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा व भोजन करवाना कल्याणकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए।
यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है। अक्षय तृतीया के दिन दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में दानी को प्राप्त होगी। अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद व भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है।भागवताचार्य पंo कृष्णकांत मालवीय के मुताबिक अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम का अवतरण व ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी माना गया है। इसी दिन माँ गंगा का अवतरण,माँ अन्नपूर्णा का जन्म, भगवान कृष्ण और सुदामा का मिलन व सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ माना गया है। बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होने व इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त होने की मान्यता भी है।
अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है और इस दिन कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। लेकिन कोरोना संकट ने मंगल घड़ियों पर अपनी छाया डाल दी।

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