आईटी उद्योग आत्मनिर्भरता की टॉनिक!

vaikseesan neeti se bhaaratavishv guru kee raah par
Dr Anil Nigam

अनिल निगम
वैश्विक महामारी कोविड-19 के दौरान भारतीय आईटी उद्योग ने जिस तरीके से अपने क्षेत्र का विस्तार किया है, उसने भारत के अन्य उद्योगों को आत्मनिर्भर बनने के लिए न केवल प्रेरित किया है बल्कि यह एक ऐसी टॉनिक है जिससे सीख लेकर भारत का संपूर्ण उद्योग जगत आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अत्यंत उत्साहित हैं। उन्होंने आईटी उद्योग के इस प्रयास को सराहा है और कहा है कि भारतीय उद्योग की विश्व में छाप है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर हमें इस क्षेत्र में अग्रणी बनना है तो उसके लिए हमें नवाचार, प्रतिस्पर्धी क्षमता और उत्कृष्टता के साथ-साथ संस्थान निर्माण पर ध्यान देना होगा।
ध्यानवत है कि कोविड महामारी के दौरान भारत के उद्योग धंधे चौपट हो गए। अनेक उद्योगों पर ताला लग गया, हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो गए। हालांकि वैश्विक महामारी का प्रतिकूल असर संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था। लेकिन इस महामारी के बावजूद भारत के आईटी सेक्टर में एक राहत की बात रही। नैसकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021 के वित्तीय वर्ष में आईटी उद्योग का राजस्व पिछले वित्त वर्ष के 190 अरब डॉलर से बढ़कर 194 अरब डॉलर हो जाएगा। कहने का आशय है कि इस सेक्‍टर में 2.3 फीसदी राजस्व की बढ़ोतरी होगी।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बीपीओ उद्योग ओएसपी नियम के दायरे से बाहर हो गए थे। 5 नवंबर 2020 को संचार मंत्रालय ने व्यावसायिक प्रक्रिया आउटसोर्सिंग (बीपीओ) और आईटी-सक्षम सेवाओं (आईटीईएस) के लिए सरल दिशा-निर्देशों की घोषणा की थी। केंद्र सरकार ने टेलीकम्युनिकेशन विभाग के अन्य सेवा प्रदान करने वाले दिशा-निर्देशों को काफी सरल कर दिया था। इससे बीपीओ उद्योग के अनुपालन बोझ में बहुत कमी आ गई। इस लचीले बदलाव के बाद आईटी उद्योग की उत्पादकता में सुखद वृद्धि दर्ज की गई।
इस समय सर्वाधिक चिंतनीय विषय यह है कि संपूर्ण भारत आत्मनिर्भर कैसे बने और ऐसा करना कब तक संभव हो सकेगा? इस मुद्दे पर विचार करने के दौरान दो ऐसे उद्योगों की चर्चा करना आवश्यक है जिसमें भारत बहुत तेजी से आगे बढ़ा है। उद्योगों के उद्गम और उनके अग्रणी बनने के तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। भारतीय दवा और भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) दोनों ऐसे उद्योग हैं, जिन्हें अगर केंद्र और राज्य सरकारों का सहारा न मिला होता तो शायद उनमें से कोई भी आज अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाता।
वर्ष 1960 के दशक में भारतीय दवा उद्योग का टर्नओवर अत्यंत कम था लेकिन आज दुनिया के दवा कारोबार में उसका अच्छा खासा दबदबा है। इससे अब सालाना 40 अरब डॉलर का राजस्व प्राप्त होता है। इसमें से 15 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात भी किया जाता है। लगभग 20,000 से ज्यादा इकाइयां दवाओं का उत्पादन कर रही हैं। इन इकाइयों में करीब 2.9 करोड़ से अधिक लोग कार्यरत हैं। आईटी उद्योग की कहानी भी खासी रोचक है। वर्ष 1990 में उसका राजस्व करीब 16.5 लाख डॉलर था, लेकिन भारत आज इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन चुका है। इसका आकार न केवल 118 अरब डॉलर का हो गया है, बल्कि भारत इसमें से 100 अरब डॉलर का निर्यात भी करता है। पहले इस सेक्टर में केवल 8,500 लोगों को रोजगार मिला हुआ था, पर आज 20 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यही नहीं, 70 लाख से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से इसके जरिये अपनी रोजी-रोटी चलाने का सुअवसर मिल रहा है। यह हम बखूबी जानते हैं कि जब किसी उद्योग का आकार बड़ा होता है तो उससे जुड़ी अनेक सेवाओं का भी विस्तार होता है। इन दोनों उद्योगों ने आवासीय निर्माण और ट्रांसपोर्टेशन सहित अनेक क्षेत्रों को कई गुना फायदा पहुंचाया है।
दोनों ही सेक्टरों ने यह साबित कर दिया हे कि अगर भारत चाहे तो किसी भी सेक्टर में आत्मनिर्भर बन सकता है। आज कई ऐसे सेक्टर हैं, जिनकी पहले पहचान करने और उस पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। चौकाने वाली बात यह है कि आज भी हम दालों और खाद्य तेलों का आयात करते हैं जबकि हम अपने ही देश में दलहन और तिलहन का पर्याप्त उत्पादन कर इसके आयात को न केवल समाप्त कर सकते हैं बल्कि उनका निर्यात कर अपनी अ‍र्थव्वस्था को अधिक सामर्थ बना सकते हैं। इसी तरह से भारत के विभिन्न समुद्री इलाकों में मछली पालन के व्यापार को व्यवस्थित करते हुए उनके असीमित भंडार का निर्यातकर अर्थव्यवस्था के संवर्धन में अभूतपूर्व योगदान किया जा सकता है।
लेकिन कहावत है कि ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’। इसलिए किसी भी सेक्टर में झंडा बुलंद करने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा। इसमें तीनों की महत्पपूर्ण भूमिकाएं हैं। भारत सरकार को जहां उद्योग की स्थापना और संचालन के लिए कानून और नियमों को सहज बनाना है, वहीं राज्य सरकारों को उनको लागू करने और लालफीताशाही के हस्तक्षेप को कम करने में सक्रियता और गंभीरता दिखाने की आवश्यकता है। दोनों सरकारों के इस पवित्र उद्देश्य को सफल बनाने के लिए निजी क्षेत्र को भी अपनी सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों की आहुति देनी होगी। नि:संदेह आत्मनिर्भरता के मंत्र को व्यावहारिक जीवन में उतारने के लिए भारत सरकार, राज्य सरकारों और निजी क्षेत्रों को धरातल पर मिलकर काम करना होगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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