राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
नई दिल्ली। हिन्दी और हिन्दुस्तान के लिए यह एक सुखद और सौभाग्यजनक खबर आई है। हिन्दी के बहुमुखी प्रचार-प्रसार और विस्तार में जी-जान से जुटे सुरेशपाल वर्मा ‘जसाला’ ने हिन्दी को तीन नई विधाएं दी हैं। वे इसके जनक और ओज के प्रखर मंचीय कवि भी हैं। उनका काव्य पाठ स्वयं में विशेष होता है। उनके कृत्य और उपलब्धियों को साहित्यिक जगत ने खूब सराहा है और मान-सम्मान से नवाजा है।
‘जसाला’ द्वारा प्रारम्भ की गई तीनों विधाओं का संक्षिप्त परिचय
प्रथम नव विधा वर्ण पिरामिड:
इस विधा को जितनी शीघ्रता से, जितने प्यार से साहित्यिक लोगों ने स्वीकार किया, वह अनुपम है, शब्दों से परे है। “वर्ण पिरामिड” विधा फेसबुक पर अपने 300 सप्ताह पूर्ण कर रही है जो एक ही विधा के लिए रिकार्ड भी है। इस विधा में देश के पृथक-पृथक स्थानों से नौ काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। लगभग 150 साहित्यकार इस विधा को अपना चुके हैं।
इस विधा में प्रथम पंक्ति में – एक ; द्वितीय में – दो ; तृतीया में – तीन ; चतुर्थ में – चार; पंचम में – पांच; षष्ठम में – छः; और सप्तम में – सात वर्ण हैं। यह रचना वर्णों के बढ़ते क्रम में लिखी जाती है जो पिरामिड का रूप ले लेती है, अतः इसको ” वर्ण पिरामिड ” नाम दिया गया और ‘जसाला’ द्वारा प्रारम्भ किए जाने के कारण इसको “जसाला पिरामिड” भी कहा गया। ‘जसाला’ इनके गांव का नाम है जो शामली जनपद के अंतर्गत आता है।
उदाहरण स्वरूप कुछ वर्ण पिरामिड रचनाएं:
- शिव
या
हर
अधर
आधार तू
साकार भी तू
निराकार भी तू
है राग झंकार तू । (1) - चाय
दे
ऊर्जा
सुस्फूर्ति
मैत्री पूर्ति
रिश्तों की शान
चाय की चुस्कियां
हंसी-खुशी मस्तियां । (2)
दूसरी नव विधा – सिंहावलोकनीदोहा मुक्तक:
दोहे के नियमानुसार सृजित मुक्तक में, जिस शब्द या शब्दों से पंक्ति समाप्त होती है, उसी शब्द या शब्दों से अगली पंक्ति प्रारम्भ होती है। मुक्तक में तीसरी पंक्ति का तुकांत भिन्न होता है। उदाहरण स्वरूप सिंहावलोकनी दोहा मुक्तक-
सच्चाई का खून हवै, खिला झूठ का रंग।
रंग प्यार का बह गया, है विधान भी दंग।।
दंग सभी जन मन यहाँ, देख वोट का खेल।
खेल सत्य का ही करो, रहो सभी मिल संग।।
‘जसाला’ की तृतीय व नवीनतम विधा- मनका
जैसा कि इस रचना के स्वरूप से ही पता चल जाता है कि यह बहुत ही छोटी रचना है, इसी आधार पर इसका नाम ” मनका ” रखा गया।
मनका लेखन के नियम –
1- पांच-पांच वर्ण की तीन पंक्तियां (अर्थात तीन चरण की कविता) जिसमें अर्द्ध वर्ण और मात्रा नहीं गिनी जाएंगी।
2- पहली दो पंक्तियां किसी विषय की विशेषता पर संकेत देंगी और तीसरी पंक्ति उस विषय से संबंध स्थापित करने का कार्य करेगी।
3- पहली दो अथवा बाद की दो पंक्तियों में तुकांत बोध होना भी अनिवार्य है। आवश्यक हो तो तीसरी पंक्ति में भी तुकांत मिलाया जा सकता है, जो अनिवार्य नहीं। हां समापन स्पष्ट हो।
4- प्रत्येक पंक्ति स्वयं में स्वतंत्र रहेंगी।
5- इस लघुत्तम रचना में कथन पूर्ण होने का अहसास हो।
6- किसी भी विषय या भाव पर मनका लिखा जा सकता है।
इसमें रचनाकार स्वतंत्र है। जैसे –
पेट की आग
पाप का फाग
दर्दो का खेल
*
ढ़ो रहा रोज
श्रम का बोझ
आम आदमी
*
कभी है हार
कभी है जीत
जीवन रीत
*
जुझारू मन
स्फूर्तित तन
कृषक जन
‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ ने की उज्ज्वल भविष्य की कामना
सम्पूर्ण व्यवस्था और वर्णन के साथ जसाला जी ने दिनांक 19 जनवरी 2021 को फेसबुक पटल पर “मनका सृजन” समूह का गठन कर इस विधा को विश्व पटल पर रख दिया। विभिन्न रचनाकारों ने इसे हाथों-हाथ लिया और जूनून के साथ लिखना शुरू कर दिया। ‘जसाला’ पर केन्द्रित एक पत्रिका ने अपने नवम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित किया था। जिसमें देश के अनेकों साहित्यकारों ने उनके विषय में अपने विचार प्रस्तुत किए।साहित्य जगत को अपूर्व योगदान के लिए सुरेशपाल वर्मा जसाला बधाई के पात्र हैं। ‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ उनके उज्ज्वल भविष्य और स्वस्थ जीवन की कामना करता है।


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